शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

नक्सलवाद: एक नजर

पिछले दिनोँ बी बी सी हिन्दी पर"क्या सरकार को बँधक बनानेवालोँ से बातचीत करनी चाहिए?" इस विषय पर परिचर्चा सुन रहा था| किसी ने कहा, सभी क्राँतिकारी पडोसी के घर चाहते हैँ अपने यहाँ कोई नही, यही बात बँधकोँ पर भी लागू होती हैँ| सभी बँधक व्यक्तियोँ के परिवारवाले सरकार से उनकी रिहाई के लिए सभी प्रयास करने का आग्रह करते हैँ इसलिए सरकार को न सिर्फ बँधक बनानेवालोँ से वार्ता करना चाहिए वरन् आवश्यक होने पर बँधको की जिन्दगी हेतू जेल मेँ बँद उग्रपंथियोँ को मुक्त भी कर देना चाहिए| बहुतोँ ने नक्सल समस्या के मूल पर विचार करने पर बल दिया| मन मेँ एक प्रश्न बार-बार उठता रहा क्या सिर्फ बँधको की जिन्दगी का ही विचार किया जाना चाहिए|जो लोग मुठभेड मेँ मारे गये उनकी जिन्दगी का कोई मोल नही| पता नहीँ ये मुक्त होने के बाद और कितने बेगुनाहोँ को मारते|

वैसे बिहार के बँधक घटनाक्रम मेँ मीडिया की भूमिका भी पीपली लाईव की याद दिलाती रहीँ|उनका सारा ध्यान बँधकोँ एवं उनके परिवारवालो पर ही लगा रहा|किसी ने भी मारे गये लुकास टेटे या पहले शहीद पुलिसकर्मियोँ के परिजनोँ की कोई सुध न ली|

कुछ लोग मानते हैँ कि नक्सली समस्या विकास की कमी से उपजी हैँ|आदिवासी वर्ग तक विकास का लाभ नहीँ पहुँचा हैँ,उल्टे पुलिस एवं प्रशासन द्वारा उन पर अत्याचार किए जाते हैँ|इससे वे हथियार उठाने को मजबूर हुए हैँ|मैँ इसे दूसरेँ नजरिये से देखता हूँ|मै इसे कानून एवं व्यवस्था की समस्या मानता हूँ| हमारे वर्तमान सामंतवादी ढांचे के तहत प्रतिदिन न जाने कितनोँ के साथ अन्याय होता है|तो क्योँ नहीँ सभी हथियार उठा लेते हैँ?वस्तुतः नक्सलवाद उन्ही क्षेत्रोँ मेँ पनपा है जहाँ कानून एवं व्यवस्था की स्थिति ठीक नहीँ हैँ| ये अपराधी लोग है जो बन्दूक के बल पर वसूली करते हैँ| कम से कम बिहार के मुगेँर जैसे कुछ जगहोँ पर तो ये बात लागू होती ही हैँ|अगर नक्सली वाकई मेँ आदिवासी हितोँ के संरक्षक हैँ तो उनके द्वारा आदिवासी टेटे की हत्या को कैसे जायज ठहराया जायेगा|जिनमेँ मानवता नहीँ, दया-करुणा नहीँ;जो एक मनुष्य की हत्या करने मेँ तनिक भी संकोच नहीँ करते: उनके परिवार पर आनेवाली विपत्ति की नही सोच पाते, कैसे मान लिया जाए की वे ऐसा गरीब आदिवासियोँ की दुर्दशा से व्यवथित होकर कर रहेँ!उनकी भलाई के लिए कर रहेँ!

वैसे हमारे यहाँ भी एक रिवाज है कि सरकारेँ लोकतांत्रिक तरीकोँ से रखी गयी माँगोँ पर विचार नहीँ करती|कितनी बार सरकार ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनोँ या नागरिक समूहोँ के ज्ञापनोँ के कारण अपने फैसले पर पुर्नविचार किया है?किन्तु जब कभी हिँसक प्रदर्शन हुए, रेल-सड़क यातायात बाधित किए गये, सरकारी संपति को क्षति पहुँचायी गयी;सम्बद्ध माँगो को तुरन्त मान लिया गया|राजस्थान का गुर्जर आन्दोलन इसका उदाहरण हैँ|इस आधार पर नक्सलियोँ द्वारा गरीबोँ एवं पिछड़ी जनता के हित मेँ हथियार उठाने को समझा जा सकता हैँ|किन्तु, आज जब सरकार द्वारा इस ओर ध्यान दिया जा रहा है, नक्सलियोँ से सहानुभूति रखनेवाला व्यापक बुद्धिजीवी वर्ग है; तो हिँसक आन्दोलन क्या औचित्य रह जाता है?क्या मीडिया,वकीलोँ, समाजसेवकोँ आदि का ऐसा तंत्र नही बनाया जा सकता जो आदिवासियोँ एवँ वंचितोँ के हित मेँ कार्य करेँ?जिनकी जमीन सरकार द्वारा छीन ली गई उन्हेँ न्याय दिलाने के लिए वकीलोँ का ऐसा वर्ग नही बनाया जा सकता जो मुफ्त मेँ या फिर कम शुल्क पर अपनी सेवा देँ? वैसे भी आज भ्रष्ट प्रशासकोँ को बेनकाब करने के लिए हमारे पास सूचना का अधिकार जैसा कानून हैँ||यदि नक्सली वाकई आदिवासियोँ के कल्याण के लिए कार्य करने वाले सच्चे लोग है तो क्या ऐसे लोगोँ का एक संगठन नहीँ बनाया जा सकता जो व्यवस्था के भीतर अपनी लड़ाई लड़े?वे अपना एक राजनीतिक दल भी बना सकते हैँ और यदि वाकई उन्हेँ जनता का समर्थन हासिल जैसा की वे दावा करते है तो वे विधायिका के भीतर अपनी आवाज बुलन्द कर सकते हैँ|

जब अरुन्धिती राय जैसे लोग नक्सली हिँसा का समर्थन करते नजर आते हैँ तो ऐसे बुद्धिजीवी लोगोँ के मानसिक दिवालियापन पर तरस आता हैँ|उनके द्वारा सरकारी हिँसा के प्रतिशोध या व्यापक युद्ध को आधार बनाकर सैकड़ोँ पुलिसकर्मियोँ की हत्या की निन्दा नहीँ की जाती|आखिर ये लोग वर्तमान व्यवस्था के बदले कैसी व्यवस्था चाहते हैँ? इतिहास मेँ हमने देखा है कि समाजवाद के नाम पर आमजनता पर कितने निर्मम अत्याचार किए गए थे| सच तो यह है कि ऐसे लोग नक्सल समस्या पर घंटो बहस कर सकते हैँ, कई किताबेँ लिख सकते है|किन्तु , इसका कोई व्यवहारिक समाधान नहीँ सुझा सकते|हमारी वर्तमान व्यवस्था मेँ चाहे लाख बुराई हो अराजकता या बन्दूक का शासन इसका विकल्प नहीँ हो सकता| वैसे भीआज इससे कोई इन्कार नहीँ कर सकता कि लोकतंत्र का कोई विकल्प नहीँ| यदि इसका कोई विकल्प है तो वह हैँ स्वंय लोकतंत्र|

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